हिंद की चादर श्री गुरु तेग बहादुर जी

By gurudev

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🌸 श्री गुरु तेग बहादुर जी की दिव्य जीवन गाथा 🌸

(धर्म, त्याग और बलिदान की अमर कथा)


🔶 जन्म एवं आरंभिक जीवन

सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म tags 1 अप्रैल 1621 ई. को अमृतसर के निकट गुरु का महल (होलगढ़) में हुआ।
आपके पवित्र पिता थे — श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी, जो सिखों के छठे गुरु थे,
और माता थीं माता नानकी जी, जो अत्यंत भक्त और संतस्वरूपा थीं।

आपका बाल्यकालीन नाम था त्यागमल,
परंतु जब आपने एक युद्ध में अपने पिता के साथ वीरतापूर्वक दुश्मनों का सामना किया,
तब गुरु हरगोबिंद जी ने प्रसन्न होकर आपको नाम दिया —

“तेग बहादुर” — अर्थात् तलवार के धनी और धर्म के रक्षक।


🔶 शिक्षा एवं संस्कार

गुरु हरगोबिंद जी ने आपको सांसारिक और आध्यात्मिक — दोनों प्रकार की शिक्षा दी।
आपने गुरुमुखी, संस्कृत, फारसी, और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया।
साथ ही आपने तलवार चलाना, घुड़सवारी, और युद्धकला में भी दक्षता प्राप्त की।

युवा अवस्था से ही आपमें गहन वैराग्य, ध्यान, और ईश्वर प्रेम झलकता था।
आप अधिकतर समय ईश्वर-नाम-स्मरण और ध्यान में व्यतीत करते।
आपका स्वभाव गंभीर, शांत और करुणामय था।


🔶 विवाह एवं गृहस्थ जीवन

गुरु तेग बहादुर जी का विवाह माता गुजरी जी के साथ हुआ —
जो भक्त, विनम्र और परम त्यागमयी स्त्री थीं।
दोनों ने मिलकर गृहस्थ जीवन में भी सेवा, भक्ति और धर्म को सर्वोपरि रखा।


🔶 बकाला में साधना और तपस्या

गुरु हरगोबिंद जी के ज्योति ज्योत समाने के पश्चात गुरु तेग बहादुर जी ने गांव बकाला में निवास किया।
वहां उन्होंने वर्षों तक नाम-स्मरण, ध्यान, और तपस्या में समय बिताया।
आपका जीवन एक सच्चे संन्यासी की भांति था —
बाह्य वैभव से दूर, केवल परमात्मा की भक्ति और लोक-सेवा में लीन।


🔶 गुरु पद की प्राप्ति

सातवें गुरु हर राय जी के बाद, आठवें गुरु हरकिशन जी का देहावसान 1664 ई. में हुआ।
अपने अंतिम समय उन्होंने संकेत दिया —

“गुरु बकाले में है।”

यह वचन सुनकर अनेक लोग बकाला पहुँचे,
परंतु भाई मखन शाह लुबाना, जो सच्चे भक्त थे, उन्होंने असली गुरु की पहचान की।
उन्होंने कहा —

गुरु लाडो रे लाडो!” (सच्चे गुरु मिल गए।)

और इस प्रकार श्री गुरु तेग बहादुर जी नौवें गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हुए।


🔶 धर्म प्रचार और यात्राएँ

गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म की ज्योति पूरे भारतवर्ष में फैलाने के लिए यात्राएँ कीं।
उन्होंने पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम आदि में जाकर ईश्वर का संदेश दिया।

जहाँ भी गए, उन्होंने लोगों को यह उपदेश दिया —

  1. नाम जपो — हर क्षण ईश्वर का स्मरण करो।
  2. किरत करो — ईमानदारी से जीविका चलाओ।
  3. वंड छको — जो कमाओ, उसमें से दूसरों को भी बाँटो।
  4. धर्म की रक्षा करो, चाहे प्राण क्यों न देने पड़ें।

बिहार के पटना साहिब में रहते हुए गुरु जी ने सत्संग और सेवा का प्रसार किया।
वहीं पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी (दसवें गुरु) का जन्म 1666 ई. में हुआ।


🔶 औरंगज़ेब का अत्याचार एवं कश्मीरी पंडितों की पुकार

उस काल में मुगल शासक औरंगज़ेब ने अत्याचारों की सीमा पार कर दी थी।
उसने पूरे हिंदुस्तान में धर्म परिवर्तन के आदेश जारी कर दिए।
कश्मीर के हिंदू पंडितों को जबरन मुसलमान बनाया जा रहा था।

भयभीत होकर कश्मीरी ब्राह्मणों का दल गुरु तेग बहादुर जी के शरण में आया।
उन्होंने विनती की —

“हे सतगुरु! हमारे धर्म की रक्षा कीजिए, नहीं तो सनातन धर्म मिट जाएगा।”

गुरु जी ने शांत भाव से उत्तर दिया —

“यदि तेग बहादुर अपने प्राण त्याग दे तो हजारों लोगों का धर्म बच जाएगा।”

यह था उनका महान आत्मबलिदान का संकल्प।


🔶 गिरफ्तारी और यातना

जब कश्मीरी पंडित औरंगज़ेब के दरबार में गए तो उन्होंने कहा —

“यदि गुरु तेग बहादुर जी इस्लाम स्वीकार कर लें, तो हम सब कर लेंगे।”

यह सुनकर औरंगज़ेब क्रोधित हुआ और आदेश दिया कि गुरु जी को गिरफ्तार किया जाए।
गुरु जी को आनंदपुर से दिल्ली लाया गया और चाँदनी चौक की जेल में बंद किया गया।

उनके साथ तीन महान शिष्य भी बंदी बनाए गए:

  1. भाई मतीदास जी — जिन्हें आरी से चीर दिया गया।
  2. भाई सतीदास जी — जिन्हें जिंदा जला दिया गया।
  3. भाई दयालदास जी — जिन्हें उबलते तेल में डालकर शहीद किया गया।

गुरु जी ने यह सब अपनी आंखों से देखा, फिर भी उनका मन अडोल और शांत रहा।
उनके मुख से केवल यही निकला —

“तेरा किया मीठा लागे, हर नाम पदारथ नानक मांगे।”


🔶 गुरु जी का बलिदान (1675 ई.)

औरंगजेब के लाख प्रयास करने के बावजूद गुरु जी इस्लाम स्वीकार करने को तैयार नही हुए क्योंकि उनपर संपूर्ण हिंदू धर्म का उत्तरदायित्व था|

आखिरकार 24 नवम्बर 1675 ई. को दिल्ली के चाँदनी चौक में
गुरु जी का शीश जो धर्म रक्षा हेतु अत्याचारियों के सामने झुका नही, काट दिया गया।
यह बलिदान केवल सिखों के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए था।

उनका शीश (सिर)भाई जीता जी (बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा नाम दिया गया भाई जीवान सिंह जी) —
गुप्त रूप से लेकर आनंदपुर साहिब पहुँचे।


वहीं पर गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरुद्वारा श्री सीस गंज साहिब की नींव रखवाई।
और जहां शरीर का संस्कार हुआ, वहां आज गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब स्थित है।


🔶 गुरु जी की शिक्षाएँ

गुरु तेग बहादुर जी ने अपने जीवन से जो संदेश दिया, वह अनन्त काल तक अमर रहेगा —

  1. धर्म की रक्षा सर्वोपरि है।
  2. सत्य और न्याय के मार्ग पर चलना ही सच्ची भक्ति है।
  3. किसी भी मज़हब को जबरन नहीं थोपा जा सकता।
  4. नाम-स्मरण और सेवा से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
  5. जिसे ईश्वर पर विश्वास है, उसे मृत्यु का भय नहीं।

उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब जी में संग्रहीत है।
उनके बाणियों में गहन आध्यात्मिक विचार, वैराग्य, और ईश्वर-एकता का संदेश है।


🔶 गुरु गोविंद सिंह जी पर प्रभाव

पुत्र गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने पिता के बलिदान को ही खालसा पंथ की नींव बनाया।
उन्होंने कहा —

“पिता ने धर्म की खातिर शीश दिया,
अब मैं तलवार उठाकर अधर्म का अंत करूंगा।”

इस प्रकार, गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान सिख इतिहास में एक धार्मिक क्रांति बन गया।


🔶 गुरु तेग बहादुर जी का महत्व

गुरु तेग बहादुर जी को सिख परंपरा में कहा गया है —

“धरम दी चादर” — धर्म की चादर।
क्योंकि उन्होंने अपने शीश से धर्म को ढक लिया, ताकि अधर्म से यह धरती अपवित्र न हो।

उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष 24 नवम्बर को “शहीदी दिवस” मनाया जाता है।
इस दिन पूरे विश्व में सिख और हिंदू दोनों ही श्रद्धा से उनका स्मरण करते हैं।


🔷 निष्कर्ष

श्री गुरु तेग बहादुर जी का जीवन हम सबको यह सिखाता है कि —

“धर्म के लिए जीना और मरना ही सच्चा जीवन है।”

उनकी गाथा केवल इतिहास नहीं,
बल्कि त्याग, साहस और सत्य की जीवित मूर्ति है।


🕊️ भावपूर्ण श्रद्धांजलि

“श्री गुरु तेग बहादुर जी अमर रहें!”
“धरम दी चादर — वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह”


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