महात्मा गांधी एवं राष्ट्रीय आंदोलन पाठ 11, कक्षा 12 इतिहास के संपूर्ण एवम

By gurudev

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Class 12 History – Chapter 11 – “महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन”


अध्याय का परिचय : गांधी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन

महात्मा गांधी आधुनिक भारत के इतिहास का वह केन्द्रबिंदु हैं जिनके बिना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कल्पना भी संभव नहीं।
उनका आगमन भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत था —
एक ऐसा युग जिसमें सत्य, अहिंसा, जन सहभागिता, नैतिकता, आत्मबल, और सामाजिक सुधार प्रमुख साधन बनकर उभरे।

1915 में उनके भारत लौटने से 1948 में उनके देहावसान तक, सिर्फ 33 वर्षों में उन्होंने भारत की राजनीति, समाज और राष्ट्रीय चेतना को पूरी तरह बदल डाला।


1. मोहनदास करमचंद गांधी : प्रारंभिक जीवन

जन्म और परिवार

  • जन्म : 2 अक्टूबर 1869, पोरबंदर (काठियावाड़, गुजरात)
  • पिता : करमचंद गांधी — पोरबंदर के दीवान
  • माता : पुतलीबाई — धार्मिक, उपवास-प्रिय, दयालु

गांधी पर बचपन से ही माता का आध्यात्मिक प्रभाव गहरा था।
सत्य, आत्मसंयम, और सामान्य जीवन-शैली उनके व्यक्तित्व की जड़ थी।

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2. शिक्षा और इंग्लैंड प्रवास

  • 1888 में इंग्लैंड गए
  • वहाँ कानून (Barrister) की पढ़ाई की
  • शाकाहार, नैतिकता, सत्य, ब्रह्मचर्य, संयम जैसे विचारों से गहरा परिचय हुआ
  • वेस्टर्न सभ्यता की चमक के बीच भी भारतीय मूल्य कायम रहे

3. दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष (1893–1914): गांधी का राजनीतिक रूपांतरण

भारत लौटने से पहले गांधी ने लगभग 21 वर्ष दक्षिण अफ्रीका में बिताए।
यहीं उनके जीवन का मूल रचनात्मक रूपांतरण हुआ और वे “गांधी” बने।

दक्षिण अफ्रीका का प्रसंग — वह घटना जिसने गांधी के जीवन को बदल दिया

  • 1893 में एक केस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका पहुँचे
  • प्रथम ही यात्रा में “श्वेत-श्रेष्ठता” के भेदभाव का सामना किया
  • “पीटरमारिट्ज़बर्ग” स्टेशन पर उनसे 1st class सीट छोड़ने को कहा गया
  • मना करने पर ट्रेन से फेंक दिया गया

यह वही पल था जिसने गांधी को सोचने पर मजबूर किया कि…

“अन्याय के विरोध के लिए अहिंसक, सत्य-आधारित संघर्ष ही मानवता का मार्ग है।”


सत्याग्रह का जन्म

दक्षिण अफ्रीका में ही “सत्याग्रह” का जन्म हुआ:

सत्य + आग्रह = सत्याग्रह

  • सत्य को थामे रहना
  • अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध
  • स्वयं कष्ट सहकर प्रतिद्वंद्वी को नैतिक रूप से जीतना

दक्षिण अफ्रीका में उनके प्रमुख आंदोलन

  1. 1906—एशियाई विरोधी कानूनों के विरुद्ध सत्याग्रह
  2. फीनिक्स आश्रम और टॉल्स्टॉय फार्म की स्थापना
  3. 1913—ट्रांसवाल मार्च
  4. दक्षिण अफ्रीका के भारतीय मजदूरों के अधिकारों की रक्षा

यहाँ गांधी स्थिर, तपस्वी, अनुशासित और आध्यात्मिक राजनीतिक नेता के रूप में उभरे।


4. गांधी का भारत आगमन (9 जनवरी 1915)

भारत वापसी पर उनका भव्य स्वागत हुआ।
लेकिन गांधी ने तुरंत राजनीति में कूदने की बजाय:

  • भारत को समझने
  • जनता के दुख-सुख को परखने
  • समाज के निचले तबकों से मिलने

को प्राथमिकता दी।

गोपाल कृष्ण गोखले—गांधी के राजनीतिक गुरु

गांधी ने 1 वर्ष भारत भ्रमण गोखले की सलाह पर किया।
गांधी की शैली बनी:

  • जमीन से जुड़कर नेतृत्व
  • प्रत्यक्ष निरीक्षण
  • जनता के दुख-दर्द का आकलन

5. गांधी से पूर्व भारतीय राजनीति की स्थिति

1915 तक भारतीय राजनीति में मुख्यतः दो धारा थीं—

1. नरमपंथी (Moderates)

  • याचना की राजनीति
  • संविधानिक सुधारों की मांग
  • ब्रिटिश सरकार से सहयोग

2. गरमपंथी (Extremists)

  • स्वराज की खुली मांग
  • क्रांतिकारी कार्यवाही
  • लोकमान्य तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय

नए मोड़ की जरूरत

ब्रिटिश शासन का दमन बढ़ रहा था।
प्रथम विश्वयुद्ध के कारण——

  • कर
  • भर्ती
  • महंगाई
    ने जनता को कष्ट में डाल दिया था।

इसी पृष्ठभूमि में गांधी का आगमन एक नई राजनीतिक संस्कृति लेकर आया।


6. गांधी के नेतृत्व की प्रारंभिक झलक: तीन प्रारंभिक आंदोलन (1917–1918)

गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश जन-संघर्ष से किया।
नई शैली प्रदर्शित हुई:

(1) चंपारण आंदोलन (1917)

स्थान : बिहार
उद्देश्य : नील किसानों को बंधुआ प्रथा “टिंकठिया” से मुक्ति

  • किसानों से जबरन नील उगवाया जाता था
  • बगावत करने पर अत्याचार
  • अंग्रेजी नीलहों का शोषण

गांधी चंपारण पहुँचे—भारी दमन की आशंका


लेकिन जनता ने उनके पीछे संगठित होकर सत्याग्रह किया।

परिणाम—

  • टिंकठिया प्रथा समाप्त
  • किसानों को राहत
  • गांधी का प्रभाव देशव्यापी

यह गांधी का भारत में पहला सत्याग्रह था।


(2) खेड़ा सत्याग्रह (1917-18) — किसान संघर्ष का नया अध्याय

खेड़ा की पृष्ठभूमि

  • गुजरात के खेड़ा ज़िले में 1917–18 के दौरान भीषण सूखा पड़ा।
  • खरीफ़ और रबी—दोनों फसलें लगभग पूरी तरह नष्ट हो गईं।
  • अंग्रेज़ सरकार का नियम था कि कर तभी माफ़ हो सकता है जब पैदावार 25% से कम हो।
  • किसान बार-बार कह रहे थे कि पैदावार बेहद कम है, पर सरकार ने उनके आकलन को ठुकरा दिया।
  • किसानों की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई—कर्ज़ बढ़ गए, भोजन तक कठिनाई से मिल रहा था।

किसानों की मुख्य मांगें

  1. राजस्व (land revenue) की पूर्ण माफी
  2. जब तक स्थिति सुधरे, कर न वसूला जाए
  3. जब्ती की कार्रवाई बंद हो
  4. किसानों को कानूनी संरक्षण दिया जाए

गांधीजी का प्रवेश

  • पटना, खेड़ा और चंपारण में गांधीजी को किसानों की पीड़ा समझ में आई कि ब्रिटिश राज के अधीन किसान किस हद तक शोषित थे।
  • खेड़ा आंदोलन में प्रमुख साथी:
    • सरदार वल्लभभाई पटेल (मुख्य रणनीतिकार)
    • इमाम साहब
    • नागिंदा भाई
    • मणिलाल गांधी
  • गांधीजी ने किसानों को कहा कि यदि फसल नष्ट हुई है, तो कर देना नैतिक रूप से गलत है।
  • आंदोलन का आधार—सत्याग्रह + अहिंसक असहयोग + सत्य पर आधारित दलीलें।

आंदोलन का स्वरूप

  • राजस्व न देने का सामूहिक संकल्प
  • किसानों का भोजन बनकर रहना—एकता अद्भुत रही
  • दमन:
    • जब्ती, नीलामी, मुकदमे, गिरफ्तारी
    • किसान घर छोड़कर जंगलों व पहाड़ियों में छिपने लगे

सरदार पटेल की भूमिका

  • गाँव-गाँव घूमकर किसानों को संगठित किया
  • सत्याग्रह को अनुशासित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका
  • अंग्रेज़ों के हर दमन का तथ्यात्मक दस्तावेजीकरण

आंदोलन का परिणाम

  • सरकार ने गुप्त बैठक कर समझौता किया
  • जिनकी फसल खराब थी, उनसे कर माफ़
  • बाकी किसानों को कर में बड़ी छूट
  • जब्ती की कार्रवाई वापस
  • आंदोलन ने गांधीजी की प्रतिष्ठा को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया
  • सरदार पटेल को ‘गुजरात का लौहपुरुष’ के रूप में पहचान मिली

खेड़ा का ऐतिहासिक महत्व

  • गांधीजी पहली बार वृहत किसान संघर्ष के नेता बने
  • अहिंसक सत्याग्रह का मॉडल पूरे देश में स्वीकार हुआ
  • किसान राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे

(3). अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) — मजदूरों का पहला गांधीवादी आंदोलन

पृष्ठभूमि

  • अहमदाबाद शहर उस समय भारत का प्रमुख वस्त्र उद्योग केंद्र था।
  • मजदूरों और मालिकों के बीच वेतन को लेकर विवाद था।
  • मालिकों ने उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर मजदूरी कम कर दी थी।
  • मजदूरों ने विरोध किया—परंतु वे असंगठित थे।

गांधीजी का हस्तक्षेप

  • गांधीजी ने मजदूरों की स्थिति देखी—कम मजदूरी, लंबे घंटे, सामाजिक सुरक्षा का अभाव।
  • उन्होंने मिल मालिकों और मजदूरों दोनों को ‘ट्रस्टी’ कहा—यानी दोनों को एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदार।

गांधीजी द्वारा सुझाई गई प्रमुख बातें

  1. मजदूरों के लिए 35% वेतन वृद्धि
  2. समझौते तक कार्य बंद
  3. पूर्ण अहिंसा
  4. कोई धमकी, मारपीट, हड़तालियों पर दबाव नहीं
  5. सत्याग्रह के दौरान उपवास और अनुशासन

आंदोलन की तीव्रता

  • मालिक झुकने को तैयार नहीं थे
  • मजदूर भूखे-प्यासे हड़ताल पर टिके रहे
  • गांधीजी ने उपवास सत्याग्रह किया—यह नैतिक दबाव का सर्वोच्च रूप था

परिणाम

  • मालिक मान गए
  • 35% वेतन वृद्धि
  • मजदूरों ने पहली बार खुद को एक शक्तिशाली संगठित वर्ग के रूप में देखा
  • गांधीजी को ‘मजदूर नेता’ की उपाधि मिली

महत्व

  • मजदूर वर्ग ने गांधीवादी पद्धति अपनाई
  • मालिक और श्रमिक के संबंधों में नैतिकता और विश्वास का तत्व जोड़ा
  • भारत में श्रम आंदोलनों को नई दिशा मिली

रॉलेट एक्ट (1919) — भारत के लिए “काला कानून”

पृष्ठभूमि

  • प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार को डर था कि भारत में विद्रोह होगा।
  • भारत ने युद्ध में पैसा, सैनिक, संसाधन दिए थे—लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार मिलने की उम्मीद थी।
  • परंतु सरकार ने इसके विपरीत दमनकारी Rowlatt Committee की सिफारिशें लागू कर दीं।

रॉलेट एक्ट के मुख्य प्रावधान

  1. बिना मुकदमा चलाए किसी को भी जेल
  2. अभियुक्त को वकील का अधिकार नहीं
  3. कोई अपील नहीं
  4. प्रेस पर भारी प्रतिबंध
  5. सरकारी अधिकारियों की कार्यवाही पर मुकदमे की अनुमति नहीं

गांधीजी की प्रतिक्रिया

  • गांधीजी बेहद आहत हुए; इसे अत्यंत अन्यायी और अमानवीय कानून बताया।
  • उन्होंने पूरे हिंदुस्तान को पहली बार एक बड़े आंदोलन के लिए बुलाया—
    “सत्याग्रह विरोध दिवस” (6 अप्रैल 1919)
  • हिंदू-मुस्लिम-सिख—सभी एक साथ आए।

आंदोलन का स्वरूप

  • स्वेच्छिक व्रत और उपवास
  • प्रार्थना सभा
  • जनता में जागरूकता
  • दुकानों और दफ़्तरों का बंद (हड़ताल)
  • हिंसा को कड़ाई से मना किया गया

परिणाम

  • सरकार घबरा गई
  • अनेक जगह दमन–गोलियाँ–गिरफ्तारियाँ
  • दिल्ली, पंजाब सहित कई स्थानों पर हिंसा
  • पंजाब को ‘सैन्य प्रशासन’ के अधीन कर दिया गया

जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)

पृष्ठभूमि

  • पंजाब में रॉलेट एक्ट के विरोध में तेज आंदोलन
  • दो प्रमुख नेताओं—डॉ. सैफ़ुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल को गिरफ्तार कर लिया गया
  • लोग शांति से बैसाखी मनाने और नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए

जनरल डायर का क्रूर आदेश

  • जनरल रेजिनाल्ड डायर हजारों लोगों की सभा में पहुँचा
  • बिना चेतावनी के गोलियाँ चलाने का आदेश
  • बाहर केवल एक संकरा रास्ता
  • लोग न भाग सके, न बच सके
  • लगभग 1650 राउंड गोलियाँ चलाई गईं

मृतकों की संख्या

  • ब्रिटिश रिकॉर्ड: 379
  • भारतीय रिकॉर्ड: 1,000+
  • कई लोग कुएँ में कूदकर मरे

डायर का बयान

  • वह ‘नैतिक प्रभाव’ डालना चाहता था
  • मतलब—लोगों में ऐसा भय पैदा करना कि वे आंदोलन न करें

असर

  • पूरा भारत हिल गया
  • गांधीजी ने कहा—
    “यह क्षण मेरी अंतरात्मा को झकझोर गया।”
  • उन्होंने ब्रिटेन द्वारा दिए गए ‘कायमी सम्मान’ (Kaiser-i-Hind Medal) को लौटा दिया
  • पंजाब ब्रिटिश दमन का केंद्र बन गया

“Hunter Commission”

इसकी रिपोर्ट में:

  • डायर को “गलत” कहा गया, पर सजा नहीं
  • ब्रिटेन में कई लोग उसे “नायक” कह रहे थे
  • जबकि भारत में उसे “कसाई” कहा गया

परिणाम

  • ब्रिटिश शासन का नैतिक अधिकार पूरी तरह खत्म
  • गांधीजी ने निर्णय लिया कि अब स्वतंत्रता केवल छोटे सुधारों से नहीं मिलेगी
  • पूरे देश को एक बड़े आंदोलन की ओर ले जाना होगा

खिलाफ़त आंदोलन (1919–1924)

(गांधीजी और भारतीय मुसलमानों के संबंध का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय)

पृष्ठभूमि

  • प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) के दौरान ओट्टोमन साम्राज्य की हार हुई।
  • ओट्टोमन शासक “खलीफ़ा” को विश्व के मुसलमानों का आध्यात्मिक नेता माना जाता था।
  • युद्ध के बाद ब्रिटेन ने खलीफ़ा के पद और उसके धार्मिक अधिकारों को कम करने का निर्णय लिया।
  • भारत के मुसलमान बेहद दुखी और क्रुद्ध हुए।
  • यह धार्मिक भावना राजनीति में बदल गई—जो भारतीय राष्ट्रवाद की धारा से जुड़ गई।

मुख्य मुस्लिम नेता

  1. मुहम्मद अली जौहर
  2. शौकत अली
  3. मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
  4. हाकिम अजमल ख़ान

भारत के मुसलमान क्यों आहत थे?

  • खलीफ़ा को इस्लामी दुनिया में एकता का प्रतीक माना जाता था।
  • उन्हें लगा कि ब्रिटेन मुसलमानों की धार्मिक राजनीतिक स्वतंत्रता खत्म कर रहा है।
  • यह भारत में मुस्लिम असंतोष को उबाल पर ले आया।

गांधीजी का ऐतिहासिक निर्णय

  • गांधीजी ने माना कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना स्वतंत्रता असंभव है।
  • उन्होंने खिलाफ़त आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया।
  • यह गांधीजी का अत्यंत साहसिक कदम था—क्योंकि एक धार्मिक मुद्दे को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा

1920 – खिलाफ़त समिति का गठन

  • दिल्ली में खिलाफ़त समिति बनी
  • गांधीजी को उसका मुख्य सलाहकार नियुक्त किया गया
  • गांधीजी ने प्रस्ताव रखा:
    👉 खिलाफ़त + रॉलेट एक्ट + जलियांवाला बाग = देशव्यापी असहयोग

यही असहयोग आंदोलन की आधारशिला बनी।


असहयोग आंदोलन का उदय (1920–22)

“असहयोग” क्यों ?

गांधीजी के विचार:

“जब सरकार अन्यायी हो जाती है, तो उसके साथ सहयोग करना भी पाप है।”

इसलिए जनता को कहना था:

  • सरकार के स्कूल न जाएँ
  • सरकारी अदालतों में न जाएँ
  • सरकारी सम्मान त्यागें
  • विदेशी कपड़े न पहनें
  • ब्रिटिश सामान का बहिष्कार
  • सत्य पर आधारित नैतिक दबाव

यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक होना था।


असहयोग आंदोलन की औपचारिक शुरुआत (सितंबर 1920 – कोलकाता कांग्रेस)

तीन मुख्य प्रस्ताव

  1. असहयोग आंदोलन की स्वीकृति
  2. खिलाफ़त को समर्थन
  3. पूर्ण स्वराज (Complete Independence) को लक्ष्य बनाने पर चर्चा

असहमति और बहस

कई बड़े नेता सहमत नहीं थे, जैसे—

  • मोतीलाल नेहरू
  • C.R. दास
  • एम. ए. जिन्ना

उनका तर्क:

  • आंदोलन अचानक शुरू करने से हिंसा हो सकती है
  • तैयारियाँ पूरी नहीं हैं
  • कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से मज़बूत होना चाहिए
  • स्वराज परिषद की योजना होनी चाहिए

परंतु गांधीजी की नैतिक शक्ति और जनता का उत्साह अधिक था।


नागपुर अधिवेशन (दिसंबर 1920) — ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट

परिवर्तन जो आंदोलन को जन-जन से जोड़ते हैं:

  1. कांग्रेस को जनसंगठन बनाया गया
  2. सदस्यता शुल्क 1 रुपया किया गया
  3. ग्राम इकाइयाँ बनाईं गईं
  4. कांग्रेस की संरचना को गाँव-तहसील-जिला-राज्य-केंद्र—सब में विस्तारित किया गया
  5. पूर्ण स्वराज को लंबी अवधि का लक्ष्य माना गया

इस अधिवेशन के बाद गाँधी नेतृत्व में कांग्रेस सर्वाधिक जनसामान्य का संगठन बन गई।


असहयोग आंदोलन (1921–22) का विकास

आंदोलन के प्रमुख चरण

1. सरकारी स्कूलों का बहिष्कार

  • हजारों छात्रों ने कॉलेज–स्कूल छोड़े
  • काशी विद्यापीठ, जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसी राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना
  • शिक्षा में राष्ट्रीयता का प्रवेश

2. वकीलों द्वारा वकालत छोड़ना

  • सबसे प्रभावी प्रदर्शन
  • प्रमुख वकील जिन्होंने वकालत छोड़ी:
    • C.R. दास
    • मोतीलाल नेहरू
    • राजगोपालाचारी
    • विजया राघवाचार्य
  • अदालतों में सरकार की नैतिक शक्ति कम हुई

3. विदेशी कपड़ों का बहिष्कार

  • लाखों का विदेशी माल जला दिया गया
  • खादी राष्ट्रवाद का प्रतीक बनी
  • चरखा घर–घर का अभिन्न हिस्सा
  • महिलाओं की बड़ी भागीदारी

4. शराब की दुकानों का बहिष्कार

  • स्थानीय आंदोलन बहुत प्रभावी
  • सामाजिक सुधार गांधी आंदोलन का मूल तत्व

5. पंचायतों का विकास

  • गांधीजी चाहते थे कि भारतीय अपने विवाद स्वयं सुलझाएँ
  • ‘स्वराज’ की व्यावहारिक ट्रेनिंग

6. किसानों और मजदूरों की भागीदारी

  • अवध में बाबा रामचंद्र का किसान आंदोलन
  • बारदोली, गुजरात
  • आंध्र–तमिलनाडु में ताड़ी बंदी आंदोलन
  • बंगाल में श्रमिक आंदोलन

आंदोलन का प्रभाव

  • ब्रिटिश सरकार को व्यापक नैतिक चुनौती
  • आर्थिक गिरावट—विशेषकर कपड़ा उद्योग
  • राजनीतिक वातावरण में नई ऊर्जा
  • युवा वर्ग की सहभागिता—विद्यार्थी–प्रोफेसर–महिलाएँ

गांधीजी बनाम अन्य नेता – रणनीतिक मतभेद

बिपिनचंद्र पाल / जिन्ना / सी.आर.दास के विचार

  • संघर्ष की गति तेज होनी चाहिए
  • हिंसा के डर से आंदोलन रोकना उचित नहीं
  • सरकार से सीधी बातचीत जरूरी
  • असहयोग के साथ-साथ स्वराज परिषद आवश्यक

गांधीजी की धारणा

  • आंदोलन संपूर्ण अहिंसा पर आधारित रहना चाहिए
  • जनता का नैतिक विकास पहले
  • आंदोलन तभी बड़े स्तर पर चले जब सब तैयार हों
  • “स्वराज—पहले आत्मशुद्धि, फिर राजनीति”

ये बहसें भारतीय राष्ट्रवाद की परिपक्वता का संकेत थीं।


असहयोग आंदोलन की चरम लोकप्रियता (1921)

जनसमर्थन के कारण:

  • जलियांवाला बाग की पीड़ा
  • रॉलेट एक्ट का दमन
  • औद्योगिक मंदी
  • खिलाफ़त की धार्मिक भावनाएँ
  • गांधीजी का चुम्बकीय प्रभाव

पूरे भारत में आंदोलन की गूंज:

  • पंजाब: अकाली आंदोलन
  • बंगाल: चिटगाँव–किसान–मजदूर
  • मद्रास: रामनाड में जस्टिस पार्टी का उदय
  • केरल: मोपला विद्रोह (गांधीजी ने इसकी हिंसा की निंदा की)

चौरी-चौरा घटना (5 फरवरी 1922) — टर्निंग पॉइंट

क्या हुआ?

  • पुलिस ने सत्याग्रहियों को लाठीचार्ज से घायल किया
  • भीड़ भड़क उठी—पुलिस थाने को आग लगा दी
  • 22 पुलिसकर्मी मारे गए

गांधीजी का निर्णय:

“अहिंसा की राह छोड़कर स्वराज नहीं मिल सकता।”

  • गांधीजी ने पूरे भारत में असहयोग आंदोलन को स्थगित कर दिया
  • यह भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे नाटकीय निर्णय था

प्रतिक्रियाएँ:

  • जवाहरलाल नेहरू, सुभाष बोस, सी.आर. दास—सब निराश
  • ब्रिटिश शासन को राहत
  • कांग्रेस में मतभेद तेज

गांधी की गिरफ्तारी (मार्च 1922)

  • गांधीजी को ‘अराजकता फैलाने’ का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया
  • सजा: 6 वर्ष कारावास
  • परंतु 1924 में तबीयत खराब होने पर रिहा

गांधीजी जेल में रहे—और भारत में नई राजनीतिक धारा पैदा हुई।


असहयोग आंदोलन की उपलब्धियाँ

  1. भारतीय जनता पहली बार राजनीतिक रूप से जागृत
  2. कांग्रेस → जन आंदोलन संगठन
  3. जनता की नैतिक शक्ति का अनुभव
  4. ब्रिटिश राज की नैतिक विफलता स्पष्ट
  5. हिंदू–मुस्लिम एकता अपनी चरम सीमा पर
  6. खादी–चरखा–स्वदेशी–सत्याग्रह राष्ट्रीय प्रतीक बने
  7. किसानों–मजदूरों–छात्रों–महिलाओं की बड़ी भागीदारी
  8. जनता को अहिंसा का वास्तविक प्रशिक्षण मिला

असहयोग आंदोलन की सीमाएँ

  1. चौरी-चौरा जैसी हिंसा
  2. कई नेताओं का असहमति
  3. किसान–मजदूरों के आंदोलन को कांग्रेस नियंत्रित न कर सकी
  4. मुसलमानों में असंतोष (बाद में खिलाफ़त समाप्त होने से और बढ़ा)
  5. कांग्रेस ‘राजनीतिक’ से अधिक ‘नैतिक’ संगठन बन गया|

नमक सत्याग्रह (Salt Satyagraha), 1930

नमक को आंदोलन का प्रतीक क्यों चुना गया?

  • नमक सभी वर्गों के लिए आवश्यक था—गरीब, अमीर, सबके लिए समान।
  • अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाकर भारतीयों पर अन्याय किया।
  • गांधीजी को लगा कि नमक कानून तोड़ना सबसे प्रभावी प्रतीक होगा।

दांडी मार्च (12 मार्च – 6 अप्रैल 1930)

  • गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील (385 किमी) की पदयात्रा की।
  • हजारों लोग यात्रा में शामिल हुए।
  • 6 अप्रैल 1930 को गांधीजी ने समुद्र से नमक उठाकर कानून तोड़ा।

नमक सत्याग्रह की विशेषताएँ

  • पूर्ण अहिंसा पर आधारित।
  • महिलाओं, किसानों, छात्रों, मजदूरों की बड़ी भागीदारी।
  • इसे पूरे देश में लोगों ने अपनाया—कर न देना, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, नमक बनाना, धरना आदि।
  • अंग्रेज़ सरकार ने दमन किया—गिरफ्तारियाँ, लाठीचार्ज।

सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement)

नमक सत्याग्रह → सविनय अवज्ञा आंदोलन

  • नमक सत्याग्रह ही आगे बढ़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन बना।
  • इसमें लोगों ने अंग्रेज़ी कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया।

मुख्य कार्य

  • नमक कानून तोड़ना
  • करों का भुगतान न करना
  • विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
  • ताड़ी और शराब की दुकानों पर धरना
  • राष्ट्रीय शिक्षा और स्वदेशी को बढ़ावा
  • सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार

सरकारी प्रतिक्रिया

  • बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ
  • प्रेस पर प्रतिबंध
  • कांग्रेस को अवैध घोषित किया गया
  • कई जगह हिंसा और दमन

गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences: 1930–32)

पृष्ठभूमि

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं के साथ संविधान संबंधी बातचीत करने के लिए 3 सम्मेलन बुलाए।


पहला गोलमेज सम्मेलन – 1930

  • कांग्रेस अनुपस्थित रही क्योंकि आंदोलन चल रहा था।
  • इसमें हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग, दलित, राजाओं सहित कई प्रतिनिधि थे।
  • गांधीजी की अनुपस्थिति के कारण कोई सार्थक निर्णय नहीं हुआ।

दूसरा गोलमेज सम्मेलन – 1931

  • गांधी–इरविन समझौता के बाद गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि बनकर लंदन गए।
  • गांधीजी ने भारत के लिए पूरी स्वराज्य की माँग रखी।
  • परन्तु अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचक मंडल, दलित प्रतिनिधित्व आदि मुद्दों पर मतभेद रहे।
  • सम्मेलन असफल रहा।

तीसरा गोलमेज सम्मेलन – 1932

  • कांग्रेस फिर शामिल नहीं हुई।
  • ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों, दलितों, सिखों आदि को पृथक निर्वाचन देने का प्रस्ताव रखा।
  • परिणामस्वरूप कम्युनल अवॉर्ड जारी हुआ।

गांधी–इरविन समझौता (1931)

समझौते का कारण

नमक सत्याग्रह के व्यापक प्रभाव और सरकारी दमन के बढ़ने से ब्रिटिश सरकार बातचीत के लिए तैयार हुई।


मुख्य बिंदु

  • गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेने पर सहमति दी।
  • सरकार ने—
    • सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने का वादा किया।
    • दमनकारी कार्यवाही रोकने का आश्वासन दिया।
    • शांतिपूर्ण ढंग से नमक बनाने की छूट दी (तटीय क्षेत्रों में)।

परिणाम

गांधीजी लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए।

भारतीय राजनीति में कांग्रेस की स्थिति और मजबूत हुई।

जनता में आत्मविश्वास बढ़ा कि अहिंसक संघर्ष से बड़े परिवर्तन संभव हैं।

गांधी–आंबेडकर विवाद (Gandhi–Ambedkar Conflict)

पृष्ठभूमि

1930 के दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा प्रश्न उभर रहा था—
दलितों (अस्पृश्यों) के राजनीतिक अधिकार व पृथक निर्वाचन।

डॉ. भीमराव आंबेडकर दलील देते थे कि:

  • दलितों को सामाजिक अत्याचारों से मुक्ति तभी मिलेगी जब उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति मिले।
  • इसलिए उन्हें पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) मिलना चाहिए, जैसे मुसलमानों, सिखों और अन्य समूहों को मिले थे।

गांधीजी इससे सहमत नहीं थे।
उनका मानना था कि:

  • पृथक निर्वाचक मंडल हिंदू समाज को स्थायी रूप से दो भागों में बाँट देगा—उच्च जाति बनाम दलित।
  • इससे भारतीय समाज और राष्ट्र की एकता पर गहरा खतरा आएगा।
  • वे दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग मानते थे।

इस प्रकार गांधीजी और आंबेडकर के बीच राजनीतिक टकराव पैदा हुआ।


कम्युनल अवॉर्ड (Communal Award), 1932

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को “कम्युनल अवॉर्ड” घोषित किया।
इसमें—

  • मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियंस आदि के साथ-साथ
  • दलितों को भी पृथक निर्वाचक मंडल दिया गया।

इसका अर्थ:

दलित अपने अलग प्रतिनिधि चुनेंगे, जो हिंदुओं से पृथक होंगे।

गांधीजी की प्रतिक्रिया:

  • गांधीजी ने इसे हिंदू समाज का विभाजन बताया।
  • इसके विरोध में उन्होंने येरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू किया।
  • वे चाहते थे कि दलित हिंदू समाज से अलग न हों।

पूना पैक्ट (Poona Pact), 1932)

गांधीजी के अनशन से देशभर में तनाव बढ़ा।
अंततः गांधीजी और डॉ. आंबेडकर के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ—
“पूना पैक्ट” (24 सितंबर 1932)

पूना पैक्ट के मुख्य बिंदु

  1. दलितों को पृथक निर्वाचक मंडल नहीं मिलेगा।
  2. परंतु उन्हें विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाकर मजबूत प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
    • प्रारंभिक प्रस्ताव → 71 सीटें
    • पूना पैक्ट के बाद → 148 सीटें
  3. दलित मतदाता भी सामान्य हिंदू मतदाता सूची में रहेंगे, ताकि हिंदू समाज में विभाजन न हो।
  4. सार्वजनिक नौकरियों, शिक्षा, छात्रवृत्ति, सरकारी सेवाओं में दलितों को विशेष अवसर दिए जाएँगे।
  5. ग्राम स्तर पर सामाजिक सुधार, छुआछूत उन्मूलन और समान अधिकारों को बढ़ाने पर सहमति बनी।

परिणाम

  • गांधीजी ने अनशन तोड़ा।
  • हिंदू समाज का औपचारिक विभाजन रुक गया।
  • दलितों की राजनीतिक स्थिति पहले से मजबूत हुई।
  • यह समझौता आधुनिक भारत में आरक्षण नीति की नींव माना जाता है।

गांधीजी की ‘हरिजन सेवा’ दृष्टि

पूना पैक्ट के बाद गांधीजी ने—

  • दलितों को ‘हरिजन’ (भगवान के लोग) कहना शुरू किया।
  • उन्होंने हरिजन सेवा मंडल स्थापित किया।
  • कुप्रथा–छुआछूत के खिलाफ देश में व्यापक अभियान चलाया।

गांधीजी का उद्देश्य:

  • दलितों के प्रति हिंदू समाज का व्यवहार बदलना
  • मंदिर प्रवेश, कुओं का उपयोग, स्कूल–सड़कें–बाज़ार में समानता
  • जाति आधारित भेदभाव को मिटाना
  • सामाजिक सुधार को राजनीतिक सुधार के समान महत्वपूर्ण मानना

आंबेडकर जी का दृष्टिकोण

डॉ. आंबेडकर गांधीजी की सामाजिक सुधार योजनाओं का सम्मान करते थे लेकिन असहमत थे कि:

  • केवल सुधार से दलितों को न्याय नहीं मिलेगा।
  • उन्हें सत्ता में हिस्सा चाहिए, न कि सहानुभूति
  • इसलिए दलितों को पृथक राजनीतिक पहचान मिलनी चाहिए थी।

गांधी व आंबेडकर का संबंध

  • विचारों का मतभेद → व्यक्तिगत शत्रुता नहीं।
  • दोनों भारत के भविष्य को लेकर गंभीर थे और अपने-अपने दृष्टिकोण से कार्य कर रहे थे।
  • पूना पैक्ट दोनों नेताओं के बीच ऐतिहासिक समझौता था।

दलित आंदोलन का उभार

सविनय अवज्ञा आंदोलन और गोलमेज सम्मेलन के समय:

  • अस्पृश्यता उन्मूलन, मंदिर प्रवेश, कुओं तक पहुंच जैसे मुद्दे चर्चा में आए।
  • विभिन्न दलित संगठन उभरे।
  • उनकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका बढ़ी।
  • उनके मुद्दे अब कांग्रेस व राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में आए।

सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय आंदोलन

महात्मा गांधी का मानना था कि:

  • स्वराज्य सामाजिक स्वराज्य के बिना अधूरा है।
  • जाति प्रथा, अस्पृश्यता, दहेज, शराब, अज्ञान—ये सभी राष्ट्रीय एकता को कमजोर करते हैं।
  • इसलिए उन्होंने सामाजिक सुधार को राजनीतिक संघर्ष के साथ जोड़ दिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध और भारतीय राजनीति (1939–45)

युद्ध की घोषणा बिना भारतीयों की सहमति

1 सितंबर 1939 को यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ।
ब्रिटेन ने स्वतः ही यह घोषणा कर दी|
“भारत भी ब्रिटेन के साथ युद्ध में है।”

→ भारतीय नेताओं ने इसे भारतीय स्वायत्तता का अपमान माना।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

  • कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने एक स्वर में कहा—
    “भारत की सहमति के बिना युद्ध में भारत को शामिल करना गलत है।”
  • कांग्रेस ने माँग की कि:
    • भारत को तुरंत पूर्ण स्वराज्य का आश्वासन दिया जाए।
    • युद्ध में सहयोग तभी मिलेगा जब भारत स्वतंत्र हो।

ब्रिटिश सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया।
इसलिए 1939 में सभी कांग्रेस मंत्रिमंडल त्यागपत्र दे दिया।


क्रिप्स मिशन (1942)

ब्रिटेन युद्ध में कमजोर हो रहा था।
भारत का सहयोग आवश्यक था।
इसलिए मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।

क्रिप्स प्रस्ताव – मुख्य बिंदु

  • युद्ध समाप्त होने पर भारत को डोमिनियन स्टेटस मिलेगा।
  • प्रांतों को यह अधिकार होगा कि वे भारत से बाहर रह सकें (यानी संभावित विभाजन)।
  • रक्षा का नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के पास रहेगा।

कांग्रेस का प्रतिरोध क्यों?

  • क्योंकि इससे तत्काल स्वतंत्रता नहीं मिलती थी।
  • भारत का विभाजन बढ़ावा पाता।
  • सत्ता वास्तविक रूप से ब्रिटिश हाथों में ही रहती।

गांधीजी ने कहा —
“यह प्रस्ताव एक पोस्ट-डेटेड चेक है, जो बैंक में भी जमा नहीं होगा।”

→ मिशन विफल हुआ।


भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement – 1942)

आंदोलन का कारण

क्रिप्स मिशन की विफलता + ब्रिटिश दमन + युद्ध की कठिनाइयाँ।
गांधीजी ने कहा—
“अब या कभी नहीं।”

8 अगस्त 1942 – मुंबई (ग्वालिया टैंक मैदान)

  • गांधीजी ने ऐतिहासिक नारा दिया —
    “करो या मरो (Do or Die)”
  • कांग्रेस ने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने का प्रस्ताव पारित किया।

9 अगस्त 1942 – गिरफ्तारी

  • गांधीजी, नेहरू, पटेल और पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया।
  • कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन की विशेषताएँ

नेतृत्वविहीन विद्रोह (Leaderless Mass Movement)

क्योंकि सभी प्रमुख नेता जेल में थे,
→ जनता ने स्वतः आंदोलन को आगे बढ़ाया।

जन आंदोलन का रूप

  • रेलें उखाड़ी गईं
  • तारघर पर कब्ज़ा
  • पुलिस थानों पर गाँवों में हमला
  • समानान्तर सरकारें (Parallel Governments) कई जगहों पर बनीं
    • जैसे—बलिया (उत्तरप्रदेश), सतारा (महाराष्ट्र), तामलुक (बंगाल)

युवाओं और महिलाओं की बड़ी भूमिका

  • छात्रों ने भूमिगत गतिविधियाँ चलाईं।
  • महिलाओं ने दूत, संदेशवाहक, आश्रय देने आदि कार्य किए।
  • उषा मेहता ने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया।

ब्रिटिश दमन अत्यंत कठोर

  • गोलीकांड
  • बमबारी
  • समूहिक गिरफ्तारियाँ
  • यातनाएँ

फिर भी आंदोलन को पूरी तरह दबाया नहीं जा सका।


1943–44: गांधीजी का अनशन

कैद में अत्यंत खराब स्वास्थ्य के बावजूद,
गांधीजी ने 1943 में अन्यायपूर्ण दमन के खिलाफ अनशन किया।

ब्रिटिश सरकार पर भारी दबाव बना
→ अंततः 1944 में गांधीजी रिहा किए गए।


स्वतंत्रता की अंतिम राह (1945–47)

युद्ध समाप्त — ब्रिटिश साम्राज्य कमजोर

द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त (1945)
→ ब्रिटेन आर्थिक रूप से टूट चुका था
→ भारतीय सेना भी राष्ट्रीय चेतना से भर रही थी
→ INA (आजाद हिंद फौज) के मुकदमों ने जनता को और एकजुट कर दिया

शिमला सम्मेलन 1945

सत्ता हस्तांतरण के लिए वार्ता → विफल
क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मतभेद थे।

कैबिनेट मिशन 1946

यह भारत को एकजुट रखने का अंतिम बड़ा प्रयास था।

मुख्य प्रस्ताव:

  • संघीय भारत (Federal Union)
  • प्रांतीय समूह (Groups A, B, C)
  • केन्द्रीय सरकार कमजोर, प्रांत शक्तिशाली

कांग्रेस और लीग दोनों सहमत–असहमत दोनों रहीं → विवाद जारी रहे।


प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस (Direct Action Day – 1946)

मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग तेज कर दी।
16 अगस्त 1946 को जिन्ना ने Direct Action Day बुलाया।
इसके बाद बड़े स्तर पर हिंदू–मुस्लिम दंगे भड़के।
देश में विभाजन अनिवार्य दिखने लगा।


अंतरिम सरकार (1946)

  • कांग्रेस ने अंतरिम सरकार में भाग लिया।
  • जवाहरलाल नेहरू उसके प्रमुख बने।
  • मुस्लिम लीग ने शुरुआत में बहिष्कार किया लेकिन बाद में शामिल हुई।
    → प्रशासनिक कामकाज ठप होने से तनाव और बढ़ा।

माउंटबेटन योजना (3 जून 1947)

ब्रिटिश सरकार ने अंतिम निर्णय लिया कि:

  • भारत का विभाजन होगा।
  • दो देश बनेंगे — भारत और पाकिस्तान
  • सत्ता का हस्तांतरण जल्द से जल्द होगा।
  • रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प मिलेगा।

15 अगस्त 1947 – स्वतंत्रता

भारत स्वतंत्र हुआ।
लेकिन विभाजन ने देश को गहरे घाव दिए—

  • सांप्रदायिक दंगे
  • लाखों लोगों का पलायन
  • हिंसा, अग्निकांड, लूट

गांधीजी ने दंगों को रोकने के लिए नोआखाली, दिल्ली और बंगाल में शांति यात्राएँ कीं।

उन्होंने अंतिम सांस तक कहा—
“मैं हिंदू–मुस्लिम एकता के लिए लड़ा हूँ और अंत तक लड़ता रहूँगा।”


गांधीजी का अंतिम बलिदान (30 जनवरी 1948)

नई दिल्ली में बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान
नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी।

उनके अंतिम शब्द थे —
“हे राम!”

_________समाप्त_________________

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